नैनीताल, 22 सितम्बर 2026।
ज्योलीकोट और आसपास के क्षेत्रों में दूषित पेयजल से फैली जलजनित बीमारी के मामले में उत्तराखंड सरकार ने कड़ा कदम उठाते हुए जल संस्थान और पेयजल निगम के छह अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। इस प्रकरण में दो लोगों की मौत और 400 से अधिक लोगों के बीमार पड़ने के बाद प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारी तय करने की कार्रवाई सामने आई है।
शासन की कार्रवाई में जल संस्थान हल्द्वानी के प्रभारी अधीक्षण अभियंता विशाल कुमार, नैनीताल के सहायक अभियंता मोहन सिंह रावत, अपर सहायक अभियंता रवींद्र तथा पेयजल निगम के प्रभारी अधिशासी अभियंता शशिपाल सिंह, प्रभारी सहायक अभियंता संजय कुमार आर्या और कनिष्ठ अभियंता दीपांशु शर्मा शामिल हैं। नैनीताल जल संस्थान के अधिशासी अभियंता अनीश एम. पिल्लई को भविष्य में कठोर कार्रवाई की चेतावनी दी गई है।
दूषित पानी ने मचाया था कहर
ज्योलीकोट और आसपास के क्षेत्रों में जलजनित बीमारी के मामले सामने आने के बाद बड़ी संख्या में लोग पीलिया और डायरिया की चपेट में आए। रिपोर्टों के अनुसार इस प्रकरण में एक छात्र और एक महिला की मौत हुई, जबकि 400 से अधिक लोग बीमार पड़े। प्रभावित मरीजों का उपचार विभिन्न अस्पतालों में कराया गया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य शिविर, घर-घर सर्वे, सैंपलिंग और निगरानी जैसी व्यवस्थाएं बढ़ाईं। प्रशासन की ओर से पेयजल व्यवस्था में सुधार, क्लोरीनेशन और अन्य आवश्यक कदम भी उठाए गए।
जांच में सामने आए गंभीर सवाल
प्रकरण को लेकर नैनीताल हाईकोर्ट ने भी संज्ञान लिया। रिपोर्टों के अनुसार पानी के नमूनों की जांच में कई नमूने मानकों पर खरे नहीं उतरे और कुछ नमूनों में हानिकारक बैक्टीरिया पाए गए। इस पूरे मामले में पेयजल स्रोतों, टैंकों, पाइपलाइनों, लीकेज और संभावित सीवरेज क्रॉस-कनेक्शन की जांच की जरूरत भी सामने आई।
जिलाधिकारी ने मामले की जांच के लिए मुख्य विकास अधिकारी की अध्यक्षता में समिति गठित कर कारण, जिम्मेदारी और सुधारात्मक कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी थी। साथ ही भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए स्थायी निगरानी और विभागीय समन्वय पर जोर दिया गया।
सरकार का संदेश—जनस्वास्थ्य से समझौता नहीं
छह अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई को ज्योलीकोट प्रकरण में जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रभावित क्षेत्र में सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था कब तक पूरी तरह सुनिश्चित होती है और भविष्य में ऐसी घटना दोबारा न हो, इसके लिए विभागीय स्तर पर क्या ठोस व्यवस्था लागू की जाती है।
ज्योलीकोट की घटना ने साफ कर दिया है कि पेयजल जैसी बुनियादी सुविधा में छोटी-सी लापरवाही भी बड़े जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है। अब कार्रवाई के साथ-साथ स्थायी समाधान, नियमित जल परीक्षण और जवाबदेही की व्यवस्था पर निगाहें रहेंगी।