* रोशनाबाद की प्रधानमंत्री आवास योजना बनी परेशानियों का अड्डा!
* तीन साल में ही जर्जर हुए मकान, रोशनाबाद के आवासीय निवासी बोले— “भ्रष्टाचार की कीमत हम चुका रहे हैं”
हरिद्वार,20 जुलाई।
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत रोशनाबाद में बनाए गए आवास आज अपने ही निवासियों के लिए चिंता और परेशानी का कारण बनते जा रहे हैं। सरकार ने जिन परिवारों को सुरक्षित और बेहतर जीवन देने के उद्देश्य से ये आवास बनाए गए थे, आज वही परिवार जर्जर निर्माण, जलभराव, सीवर की दुर्गंध, सुरक्षा व्यवस्था की कमी और स्मार्ट मीटर से बढ़े बिजली बिलों जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि इन आवासों का निर्माण हुए अभी ढाई से तीन वर्ष ही हुए हैं, लेकिन इमारतों की हालत किसी कई दशक पुरानी कॉलोनी जैसी दिखाई देती है। बरसात शुरू होते ही दीवारों और छतों से पानी रिसने लगता है, कई फ्लैटों में सीलन फैल जाती है और पूरे परिसर में जलभराव की स्थिति बन जाती है। लोगों का कहना है कि बारिश के दौरान आवासों में रहना तक मुश्किल हो जाता है।
निवासियों का आरोप है कि इस परियोजना के निर्माण की जिम्मेदारी हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (HRDA) के पास थी, जिसने निर्माण कार्य उत्तर प्रदेश पेयजल निगम को सौंप दिया। इसके बाद निर्माण का कार्य अन्य ठेकेदारों को दे दिया गया। अब जब निर्माण संबंधी समस्याएं सामने आ रही हैं तो कोई भी विभाग जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। लोगों का कहना है कि जब वे HRDA पहुंचते हैं तो उन्हें यूपी पेयजल निगम भेज दिया जाता है और वहां जाने पर भी उनकी शिकायतों का समाधान नहीं होता। विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं, जबकि परेशानी आम नागरिक झेल रहे हैं।
आवास परिसर में स्थापित एसटीपी प्लांट भी स्थानीय लोगों के लिए बड़ी समस्या बन गया है। उनका कहना है कि प्लांट से लगातार तेज दुर्गंध आती है, जिससे आसपास रहने वाले परिवारों का सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। और बरसात में सारा गन्दा पानी वही भर जाता है ग्राउंड फ्लोर पर बने फ्लैट्स के अंदर वह गन्दा पानी घुस रहा है और बाकि उसके ऊपर बानी इमारतों की हालत भी बहुत ख़राब है।
सुरक्षा व्यवस्था को लेकर भी लोगों में भारी नाराजगी है। उनका आरोप है कि कॉलोनी की चारदीवारी पर लगे हुए सेफ्टी वायर आज तक पूरी तरह तैयार नहीं की गई है, जिसके कारण बाहरी लोग दिवार कूदकर आना-जाना आसानी से कर रहे है। देर रात कुछ लोग दीवार फांदकर कॉलोनी में प्रवेश करते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ किरायेदार खुलेआम नशा और शराब का सेवन करते हैं, गाली-गलौज और मारपीट जैसी घटनाएं भी होती रहती हैं, जिससे परिवारों में भय का माहौल बना हुआ है।
निवासियों ने एक और गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आवासों की रजिस्ट्री के समय यह स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि दस वर्षों तक न तो आवास बेचा जाएगा और न ही किराए पर दिया जाएगा। इसके बावजूद उनका आरोप है कि HRDA से जुड़े कुछ लोगों ने स्वयं आवास लेकर उन्हें किराए पर दे रखा है। यदि यह आरोप सही हैं तो सवाल उठता है कि जिन नियमों का पालन आम लोगों से कराया जा रहा है, क्या वही नियम अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों पर लागू नहीं होते?
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार संबंधित विभागों और पुलिस से शिकायत की, लेकिन उन्हें राहत नहीं मिली। उनका आरोप है कि थाना भी इस मामले को HRDA का विषय बताकर पल्ला झाड़ लेता है, जबकि HRDA दूसरी एजेंसी की जिम्मेदारी बताकर शिकायत आगे बढ़ा देता है। ऐसे में आम नागरिक खुद को पूरी तरह असहाय महसूस कर रहे हैं।
इसी बीच स्मार्ट मीटर का मुद्दा भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहा है। निवासियों का आरोप है कि करीब चार-पांच महीने पहले उनकी अनुमति और पूर्व सूचना के बिना स्मार्ट मीटर लगा दिए गए। इसके बाद बिजली के बिल पहले की तुलना में दोगुने-तिगुने आने लगे हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों का कहना है कि वे इतने अधिक बिल भरने में सक्षम नहीं हैं। कई बार बिजली विभाग के कार्यालयों के चक्कर लगाने और शिकायत करने के बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ, बल्कि उनके साथ अभद्र व्यवहार किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।
MH7 न्यूज़ व जनता का सवाल ?
इन तमाम आरोपों ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि निर्माण कार्य में गुणवत्ता का पूरा ध्यान रखा गया था तो महज तीन वर्षों में इमारतों की ऐसी स्थिति क्यों हो गई?
यदि करोड़ों रुपये की लागत से परियोजना बनाई गई थी,तो जल निकासी, सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था क्यों विफल हो गई?
यदि रजिस्ट्री की शर्तों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जांच कौन करेगा? और यदि विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं तो आखिर इन समस्याओं का वास्तविक जिम्मेदार कौन है?
फिलहाल ये सभी आरोप स्थानीय निवासियों द्वारा लगाए गए हैं। संबंधित विभागों की ओर से इन आरोपों पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने आना बाकी है। हालांकि, जिस प्रकार की समस्याओं का दावा निवासी कर रहे हैं, वे मामले की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों तथा निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय किए जाने की मांग को और मजबूत करते हैं। अब देखने वाली बात होगी कि प्रशासन और संबंधित विभाग इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और प्रभावित परिवारों को कब तक राहत मिलती है।