ऋषिकेश, 19 जुलाई।
देहरादून–ऋषिकेश फोर/सिक्स लेन राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना को लेकर ऋषिकेश के सात मोड़ क्षेत्र में चल रहा पर्यावरण आंदोलन अब उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में आ गया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सात मोड़ पहुंचकर स्थानीय लोगों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और विभिन्न एनजीओ प्रतिनिधियों से मुलाकात की। उन्होंने लोगों की समस्याएं सुनीं और भरोसा दिलाया कि पर्यावरण एवं स्थानीय लोगों के अधिकारों से जुड़े इस मुद्दे को संसद में उठाएंगे तथा हर संभव सहयोग करेंगे।

मुलाकात के दौरान क्षेत्रवासियों ने वर्तमान धामी सरकार पर आरोप लगाया कि सड़क परियोजना के नाम पर बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है, जिससे जंगल और वन्यजीवों पर गंभीर असर पड़ रहा है। लोगों ने दावा किया कि हाथियों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं।
कुछ स्थानीय लोगों ने यह भी आरोप लगाया कि आंदोलन में शामिल लोगों और उनके परिवारों पर दबाव बनाया जा रहा है तथा उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो रही। एनजीओ प्रतिनिधियों ने भी पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखने की मांग राहुल गांधी के सामने रखी।

राहुल गांधी ने लोगों को आश्वस्त किया कि उनकी आवाज़ संसद तक पहुंचाई जाएगी। उनके दौरे के बाद यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा का विषय बन गया।

इसी बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून–ऋषिकेश सड़क परियोजना के तहत प्रस्तावित पेड़ों की कटाई पर फिलहाल रोक लगाने के निर्देश दिए। सरकार ने कहा कि पर्यावरणीय पहलुओं और जनभावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है।

हालांकि, घटनाक्रम के समय को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस इस फैसले को जनता और पर्यावरण आंदोलन की जीत बता रही है, जबकि भाजपा का कहना है कि सरकार पहले से ही विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच कुछ अहम सवाल भी उठ रहे हैं। यदि स्थानीय लोग लंबे समय से अपनी आपत्तियां दर्ज करा रहे थे, तो पेड़ों की कटाई पर रोक का फैसला अब क्यों लिया गया ? क्या यह केवल प्रशासनिक समीक्षा का परिणाम है, या बढ़ते जनदबाव और हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने भी इस निर्णय की गति को प्रभावित किया ? इन सवालों पर सरकार की ओर से विस्तृत जवाब का इंतजार रहेगा।

फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सात मोड़ का मुद्दा अब केवल सड़क निर्माण या पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं रहा। यह पर्यावरण संरक्षण, विकास की प्राथमिकताओं और राजनीतिक जवाबदेही—तीनों के बीच एक महत्वपूर्ण बहस का विषय बन चुका है।

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