हल्द्वानी, 9 अगस्त।
भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास और ‘जंगी सिक्स’ के अदम्य साहस के साक्षी रहे हवलदार करन सिंह का 89 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उनके निधन की खबर से कुमाऊं रेजिमेंट, 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों, सैन्य परिवारों और क्षेत्र के लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। हवलदार करन सिंह ने भारतीय सेना में रहते हुए वर्ष 1962, 1965 और 1971 के युद्धों में देश की सेवा की और कठिन से कठिन सैन्य परिस्थितियों में अदम्य साहस का परिचय दिया।
बचपन से था सेना में जाने का जुनून
हवलदार करन सिंह का जन्म 3 फरवरी 1937 को पिथौरागढ़ जिले के बाकू गांव में हुआ था। पहाड़ की माटी में पले-बढ़े करन सिंह के भीतर बचपन से ही देश सेवा और भारतीय सेना में जाने का जुनून था। इसी जज्बे के साथ उन्होंने 28 सितंबर 1956 को कुमाऊं रेजिमेंट में भर्ती होकर अपने सैन्य जीवन की शुरुआत की।
प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी तैनाती 6 कुमाऊं में हुई। मेहनत, अनुशासन, साहस और कर्तव्यनिष्ठा के बल पर उन्होंने अपनी यूनिट में एक भरोसेमंद और जांबाज सैनिक के रूप में पहचान बनाई। लगभग 16 वर्षों तक उन्होंने भारतीय सेना में पूरी निष्ठा के साथ सेवा की।
‘बैटल ऑफ वालोंग’ के प्रत्यक्ष सहभागी रहे करन सिंह
हवलदार करन सिंह के सैन्य जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1962 का भारत-चीन युद्ध रहा। उन्होंने ऐतिहासिक बैटल ऑफ वालोंग में हिस्सा लिया और युद्ध की विषम परिस्थितियों को बेहद करीब से देखा।
विपरीत भौगोलिक परिस्थितियों, कठिन मौसम और दुश्मन की भारी सैन्य ताकत के बावजूद 6 कुमाऊं के जवानों ने असाधारण वीरता और साहस का परिचय दिया। जवानों ने आखिरी समय तक मोर्चा संभाले रखा। इसी अदम्य शौर्य के कारण 6 कुमाऊं को सम्मानपूर्वक ‘जंगी सिक्स’ के नाम से जाना गया।
हवलदार करन सिंह इस ऐतिहासिक युद्ध के प्रत्यक्ष सहभागी और साक्षी रहे। उनके अनुभव और युद्ध की स्मृतियां भारतीय सैन्य इतिहास की उस गौरवगाथा का हिस्सा हैं, जिसमें विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों के साहस की मिसाल देखने को मिलती है।
1965 और 1971 के युद्ध में भी निभाया देश सेवा का फर्ज
1962 के युद्ध के बाद भी हवलदार करन सिंह का देश सेवा का सफर थमा नहीं। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने सक्रिय रूप से अपनी जिम्मेदारी निभाई। इसके बाद वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में भी उन्होंने भारतीय सेना के वीर सैनिक के रूप में मोर्चे पर अपना कर्तव्य निभाया।
1971 के युद्ध में भारत की ऐतिहासिक विजय के बाद दुनिया के नक्शे पर एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का उदय हुआ। इन तीन युद्धों के दौरान देश की रक्षा में योगदान देना हवलदार करन सिंह के सैन्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल रहा।
वर्ष 1972 में हवलदार पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह हल्द्वानी में बस गए और सैन्य अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और सेवा की भावना को जीवनभर अपने साथ बनाए रखा।
पिता के नक्शेकदम पर चले दोनों बेटे
हवलदार करन सिंह ने केवल स्वयं ही देश की सेवा नहीं की, बल्कि अपने परिवार में भी सैन्य परंपरा को आगे बढ़ाया। उनके दोनों बेटे ललित सिंह और हरीश सिंह भी भारतीय सेना में सेवाएं देकर सेवानिवृत्त हुए।
इस तरह एक सैनिक के रूप में शुरू हुआ उनका सफर उनके परिवार की सैन्य परंपरा में भी परिवर्तित हुआ। उनके परिवार के लिए यह गौरव की बात है कि जिस देश की रक्षा के लिए करन सिंह ने अपना महत्वपूर्ण जीवन समर्पित किया, उसी राह पर उनके दोनों बेटे भी चले।
नोएडा में चल रहा था उपचार
पिछले कुछ समय से हवलदार करन सिंह अस्वस्थ चल रहे थे और नोएडा में उनका उपचार चल रहा था। उपचार के दौरान उनका निधन हो गया। उनके निधन से पूर्व सैनिक समाज ने एक ऐसे वीर योद्धा को खो दिया, जिसने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष मातृभूमि की रक्षा के लिए समर्पित कर दिए।
उनके निधन पर पूर्व सैनिकों और सैन्य परिवारों ने गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि देश की रक्षा में अपना जीवन समर्पित करने वाले सैनिकों का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका साहस, त्याग, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
चित्रशिला घाट पर आज होगी अंतिम विदाई
हवलदार करन सिंह का अंतिम संस्कार 9 अगस्त 2026 को सुबह 9 बजे हल्द्वानी के चित्रशिला घाट पर किया जाएगा। इस दौरान कुमाऊं रेजिमेंट और 6 कुमाऊं के पूर्व सैनिकों के अलावा बड़ी संख्या में पूर्व सैनिक, सैन्य परिवार, स्थानीय लोग और गणमान्य व्यक्ति उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचेंगे।
हवलदार करन सिंह का जीवन केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि उस पीढ़ी की कहानी है जिसने देश की सीमाओं की रक्षा को अपना सर्वोच्च कर्तव्य माना। 1962 के वालोंग युद्ध से लेकर 1965 और 1971 की जंग तक उनकी सेवा भारतीय सेना के गौरवशाली इतिहास से जुड़ी रही।
‘जंगी सिक्स’ के इस वीर योद्धा को अंतिम सलाम
उनका साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति समय के साथ कभी धुंधली नहीं होगी। मातृभूमि की रक्षा में दिया गया उनका योगदान और सैन्य जीवन की वीरगाथा आने वाली पीढ़ियों को देशसेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।