ऐतिहासिक पहल से विश्वविद्यालय परिसर में दिखा उत्साह, संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां

हरिद्वार, 8 अक्टूबर 2026।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के इतिहास में गुरुवार का दिन एक महत्वपूर्ण और यादगार अवसर के रूप में दर्ज हो गया। विश्वविद्यालय में पहली बार ‘दीक्षारंभ’ कार्यक्रम का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विश्वविद्यालय में नवप्रवेशित विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत करने के साथ उन्हें विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था, गतिविधियों और अकादमिक वातावरण से परिचित कराना रहा।

पहली बार आयोजित किए गए इस कार्यक्रम को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में सुबह से ही उत्साह का माहौल देखने को मिला। नवप्रवेशित छात्र-छात्राओं में विशेष उमंग दिखाई दी, वहीं शिक्षकगण, अधिकारी और छात्र प्रतिनिधियों ने भी आयोजन को सफल बनाने में सक्रिय सहभागिता की।

दीप प्रज्ज्वलन से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ
कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय के कुलसचिव श्री दिनेश राणा, डीएसडब्ल्यू एवं छात्र कल्याण परिषद के अधिष्ठाता डॉ. लक्ष्मी नारायण जोशी, छात्र संघ अध्यक्ष श्री सुभम मिश्रा, महासचिव श्री प्रशांत गैरोला, उपाध्यक्ष सुश्री निक्की अत्री, कोषाध्यक्ष श्री तनीष चौहान, सहसचिव सुश्री मानसी वर्मा एवं विश्वविद्यालय प्रतिनिधि श्री अभिषेक ममगाई द्वारा संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया गया।

दीप प्रज्ज्वलन के साथ ही विश्वविद्यालय की ज्ञान, संस्कार और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश भी कार्यक्रम में दिखाई दिया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. लक्ष्मी नारायण जोशी ने की।

नवप्रवेशित विद्यार्थियों के लिए बना यादगार अवसर
‘दीक्षारंभ’ कार्यक्रम नवप्रवेशित विद्यार्थियों के लिए केवल स्वागत समारोह नहीं रहा, बल्कि विश्वविद्यालय के साथ उनके नए शैक्षणिक सफर की औपचारिक और उत्साहपूर्ण शुरुआत का अवसर भी बना। विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय के वातावरण से परिचित कराने तथा उन्हें अध्ययन के साथ विभिन्न शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रेरित करने पर विशेष जोर दिया गया।

कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों में आपसी परिचय और संवाद का वातावरण बना। विश्वविद्यालय परिवार में नए विद्यार्थियों का आत्मीय स्वागत करते हुए उन्हें उच्च शिक्षा के इस नए पड़ाव को पूरी लगन और सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया गया।

संगीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
समारोह में संगीत एवं विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुतियां भी आयोजित की गईं। विद्यार्थियों की प्रतिभा से सजी प्रस्तुतियों ने पूरे कार्यक्रम को जीवंत बना दिया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और नवप्रवेशित विद्यार्थियों में भी विशेष उत्साह देखने को मिला।

कार्यक्रम का कुशल मंच संचालन सुश्री गौरी ने किया। उन्होंने पूरे समारोह को प्रभावी एवं व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया और विभिन्न कार्यक्रमों की जानकारी उपस्थित लोगों तक पहुंचाई।

शिक्षकों, अधिकारियों और छात्र प्रतिनिधियों की रही सक्रिय सहभागिता
समारोह में विश्वविद्यालय के शिक्षकगण, अधिकारी तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम में श्री चंद्रशेखर, मीनाक्षी, श्री दिनेश चंद्र चमोला, श्री विनय कुमार शेट्टी सहित अनेक गणमान्य लोगों की उपस्थिति रही।
इसके अलावा उत्तराखंड प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य श्री पीयूष मलिक, श्री आदित्य तिवारी, अंशुमान, वैष्णवी, हर्ष शर्मा सहित अन्य विशिष्ट अतिथियों ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की।

विश्वविद्यालय के इतिहास में नई परंपरा की शुरुआत
विश्वविद्यालय के इतिहास में पहली बार आयोजित ‘दीक्षारंभ’ कार्यक्रम को लेकर विद्यार्थियों और शिक्षकों में अभूतपूर्व उत्साह देखा गया। आयोजन ने न केवल नवप्रवेशित विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय परिवार से जोड़ने का कार्य किया, बल्कि संस्कृत शिक्षा की परंपरा, संस्कृति और आधुनिक अकादमिक वातावरण के बीच बेहतर समन्वय का संदेश भी दिया।

कार्यक्रम के दौरान पूरे परिसर में उत्सव जैसा माहौल रहा। नवप्रवेशित विद्यार्थियों के चेहरों पर नई शुरुआत की खुशी साफ दिखाई दी। विश्वविद्यालय के लिए यह आयोजन इसलिए भी महत्वपूर्ण रहा क्योंकि इससे आने वाले वर्षों में ‘दीक्षारंभ’ को नवप्रवेशित विद्यार्थियों के स्वागत की एक नई परंपरा के रूप में आगे बढ़ाने की नींव रखी गई।

‘दीक्षारंभ’ बना नई शैक्षणिक यात्रा का पहला पड़ाव
कुल मिलाकर, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का पहला ‘दीक्षारंभ’ समारोह नवप्रवेशित विद्यार्थियों के लिए उत्साह, संस्कार, संस्कृति और नई उम्मीदों से भरा अवसर साबित हुआ। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को यह एहसास कराया कि विश्वविद्यालय में उनका प्रवेश केवल एक शैक्षणिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक नई यात्रा की शुरुआत है—जहां शिक्षा के साथ संस्कार, संस्कृति और व्यक्तित्व निर्माण को भी महत्व दिया जाता है।

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