हरिद्वार, 21 अप्रैल।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय का 21वां स्थापना दिवस इस वर्ष भव्य और ऐतिहासिक रूप से मनाया गया। समारोह में देशभर से आए विद्वानों, शिक्षाविदों, जनप्रतिनिधियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कार्यक्रम का मुख्य केंद्र संस्कृत भाषा के वैश्विक विस्तार, उसके महत्व और आधुनिक संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता पर रहा।

मुख्य अतिथि त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अपने संबोधन में कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि विश्व को जोड़ने वाली शक्ति है। उन्होंने “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को साकार करने में संस्कृत की भूमिका को रेखांकित करते हुए बताया कि आज विश्व के कई देशों में संस्कृत के प्रति रुचि तेजी से बढ़ रही है। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आधुनिक शोध के साथ इसके समन्वय पर भी बल दिया।

विशिष्ट अतिथि मदन कौशिक ने संस्कृत को रोजगार से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि भाषा का व्यापक विकास तभी संभव है जब वह रोजगार के अवसर पैदा करे। उन्होंने हरिद्वार-ऋषिकेश क्षेत्र को “संस्कृत नगरी” के रूप में विकसित करने की योजना की जानकारी दी।

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामकांत पांडे ने अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्थान की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर “केदार मानस पंचांग” का लोकार्पण भी किया गया, जिसे उत्तराखंड के लिए एक मानक पंचांग बताया गया। वक्ताओं ने इसे राज्य की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए मार्गदर्शक बताया।

संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक गैरोला ने नई शिक्षा नीति के तहत संस्कृत को डिजिटल लर्निंग और आधुनिक तकनीकों से जोड़ने के प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि राज्य के प्रत्येक जिले में “संस्कृत ग्राम” स्थापित करने की पहल की जा रही है।

कार्यक्रम में विश्वविद्यालय की शोध पत्रिका “शोध प्रज्ञा” के माध्यम से ज्ञान-विस्तार के प्रयासों की भी सराहना की गई। साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों और विद्वानों को सम्मानित किया गया।

समारोह के दौरान यह घोषणा भी की गई कि विश्वविद्यालय जल्द ही योग, ज्योतिष, भागवत अध्ययन और ऑनलाइन शिक्षा जैसे नए पाठ्यक्रम शुरू करेगा। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाने की योजना भी सामने रखी गई।

वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि 21 वर्ष पूरे करने के बाद विश्वविद्यालय अब अपने स्वर्णिम भविष्य की ओर अग्रसर है और संस्कृत के वैश्विक विस्तार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए तैयार है।

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