देश , 29 मई ।
उर्दू शायरी की दुनिया गुरुवार को उस आवाज़ से महरूम हो गई, जिसने दशकों तक मोहब्बत, तन्हाई, याद और इंसानी दर्द को अल्फाज़ दिए। मशहूर शायर बशीर बद्र अब हमारे बीच नहीं रहे। 91 वर्ष की उम्र में भोपाल में उन्होंने अंतिम सांस ली। लंबे समय से डिमेंशिया जैसी बीमारी से जूझ रहे बशीर बद्र धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खोते चले गए, लेकिन उनकी शायरी करोड़ों दिलों की यादों में हमेशा ज़िंदा रहेगी।

यह सिर्फ़ एक शायर का निधन नहीं, बल्कि उर्दू अदब के उस दौर का अंत है, जहां शेर किताबों तक सीमित नहीं थे, बल्कि लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे। उनके निधन की खबर आते ही अदबी दुनिया में शोक की लहर दौड़ गई और सोशल मीडिया से लेकर साहित्यिक मंचों तक उनके मशहूर शेर गूंजने लगे।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…

यह शेर सिर्फ़ अल्फाज़ नहीं, बल्कि इंसानी दर्द, विस्थापन और टूटते समाज का दस्तावेज़ बन गया। संसद से लेकर सड़क तक, हर उस जगह यह शेर सुनाई दिया जहां इंसानियत ज़ख्मी हुई।

15 फरवरी 1935 को जन्मे सैयद मोहम्मद बशीर बद्र ने उर्दू ग़ज़ल को मुश्किल शब्दों और भारी अदबी दायरों से निकालकर आम लोगों की ज़ुबान बना दिया। उनकी शायरी में दर्द था लेकिन शिकायत नहीं, मोहब्बत थी मगर दिखावा नहीं। यही वजह रही कि उनके शेर सीधे लोगों के दिलों में उतर गए।

उनकी जिंदगी भी किसी ग़ज़ल से कम नहीं रही। मेरठ दंगों में उनका घर जला दिया गया, जिसमें उनकी डायरी, नई ग़ज़लें और वर्षों की यादें राख हो गईं। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। दोस्तों की मदद से अपनी जली हुई ग़ज़लों को दोबारा याद किया और फिर लिखा। शायद इसी वजह से उनकी शायरी में “घर”, “याद”, “बस्ती” और “विस्थापन” बार-बार लौटते रहे।

बशीर बद्र उन चुनिंदा शायरों में रहे जिनके शेर हर तबके, हर विचारधारा और हर पीढ़ी की ज़ुबान पर रहे। मुशायरों में उनकी मौजूदगी किसी सितारे से कम नहीं होती थी। लोग सिर्फ़ उन्हें सुनने दूर-दूर से पहुंचते थे।
लेकिन वक्त का सबसे दर्दनाक सच शायद यही रहा कि जिसने दुनिया को हजारों शेर याद कराए, वही शायर धीरे-धीरे अपनी याददाश्त खो बैठा।

आज जब समाज नफरतों और बंटवारे के दौर से गुजर रहा है, तब बशीर बद्र के शेर और ज्यादा जरूरी महसूस होते हैं। उन्होंने उर्दू को सिर्फ़ अदब नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जिंदगी का हिस्सा बना दिया।

आज वो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके अल्फाज़ अब भी ज़िंदा हैं — किसी उदास शाम में, किसी अधूरी मोहब्बत में, किसी उजड़े घर की दीवार पर और किसी पुरानी डायरी के पन्नों में।

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा…”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!