हरिद्वार ।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय में आयोजित संस्कृत सप्ताह महोत्सव के दौरान कुलपति प्रो. रमाकांत पांडे ने Gen Z यानी युवा पीढ़ी के प्रदर्शनों, बदलती सोच और भारतीय संस्कृति से उसके जुड़ाव को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। दिल्ली में हुए हालिया Gen Z प्रदर्शन का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार है, लेकिन विरोध की अभिव्यक्ति में भाषा, व्यवहार और मर्यादा का संयम भी उतना ही आवश्यक है।
कुलपति ने कहा कि विरोध करना भारतीय परंपरा में कोई नई बात नहीं है। भारत में अपनी बात तर्क और संवाद के माध्यम से रखने की समृद्ध परंपरा रही है। संस्कृत में भी शास्त्रार्थ और वैचारिक विमर्श के माध्यम से मतभेद व्यक्त करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौर में भी संस्कृत और भारतीय भाषाओं ने जनजागरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आधुनिक सोच के साथ जड़ों से जुड़े युवा
प्रो. पांडे ने कहा कि आज की Gen Z पीढ़ी तेजी से बदलती दुनिया का हिस्सा है। तकनीक, सोशल मीडिया और वैश्विक विचारों ने युवाओं की सोच को व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ उन्हें अपनी संस्कृति, परिवार, संस्कार और भारतीय ज्ञान परंपरा की जानकारी होना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता अपनाने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन आधुनिक बनने की दौड़ में अपनी जड़ों से कट जाना उचित नहीं। युवाओं को आधुनिक दृष्टिकोण के साथ अपनी विरासत को समझना चाहिए, क्योंकि जिस पीढ़ी को अपनी जड़ों और इतिहास का ज्ञान होता है, वही भविष्य को अधिक मजबूती से दिशा दे सकती है।
NEP 2020 में भारतीय ज्ञान परंपरा पर जोर
कुलपति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान परंपरा को शामिल करने का उद्देश्य भी विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत से परिचित कराना है। उन्होंने कहा कि संस्कृत इस ज्ञान परंपरा को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि संस्कृत को केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित करके देखना उचित नहीं है। संस्कृत एक समृद्ध भाषा है, जिसमें दर्शन, व्याकरण, साहित्य, गणित, चिकित्सा, खगोल, राजनीति, नीति और अनेक अन्य विषयों से जुड़े महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई है।
‘संस्कृत किसी एक धर्म की भाषा नहीं’
प्रो. पांडे ने कहा कि संस्कृत को किसी एक धर्म तक सीमित करना भी सही दृष्टिकोण नहीं है। जिस प्रकार हिंदी और अंग्रेजी संवाद और ज्ञान की भाषाएं हैं, उसी प्रकार प्राचीन भारत में संस्कृत ज्ञान, चिंतन और संवाद की महत्वपूर्ण भाषा रही है। इसके साहित्य में भारतीय सभ्यता के विविध पक्षों की व्यापक अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि युवा पीढ़ी आधुनिक तकनीक और वैश्विक दृष्टिकोण के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परंपरा को भी समझे। विरोध हो, सवाल हों और वैचारिक असहमति भी हो, लेकिन अभिव्यक्ति में संस्कार, संवाद में संयम और व्यवहार में मर्यादा बनी रहनी चाहिए।
कुलपति के अनुसार, संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा युवाओं को केवल अतीत से जोड़ने का माध्यम नहीं, बल्कि अपनी पहचान को समझते हुए भविष्य का निर्माण करने की प्रेरणा भी दे सकती है।