प्रतियोगिताओं के विजेता छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार एवं प्रशस्ति पत्र देकर किया सम्मानित, संस्कृत के वैज्ञानिक पक्ष पर हुआ मंथन

हरिद्वार।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में विगत एक सप्ताह से चल रहे संस्कृत सप्ताह महोत्सव का भव्य एवं गरिमामय समापन वेद मंत्रों की पावन ध्वनि, छात्रों के शास्त्रार्थ, सांस्कृतिक एवं बौद्धिक प्रस्तुतियों और प्रतिभाओं के सम्मान के साथ हुआ। पूरे सप्ताह विभिन्न विभागों में आयोजित विविध कार्यक्रमों एवं प्रतियोगिताओं ने विश्वविद्यालय परिसर को संस्कृतमय बना दिया। समापन समारोह में विभिन्न प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार राशि एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।

समारोह के मुख्य अतिथि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने अपने सारगर्भित एवं प्रेरणादायी उद्बोधन में कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है। उन्होंने कहा कि विदेश प्रवास के दौरान उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है कि विदेशी धरती पर भी संस्कृत को लेकर कितना गौरव, उत्साह और जिज्ञासा है। विदेशों में अनेक विद्वान संस्कृत का अध्ययन कर रहे हैं और भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने के लिए इस भाषा की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

प्रो. लोहनी ने कहा कि संस्कृत खगोलशास्त्र, नाट्यशास्त्र और विज्ञान जैसे विविध ज्ञान क्षेत्रों की अभिव्यक्ति की अत्यंत समर्थ भाषा रही है। भारतीय ज्ञान परंपरा की आत्मा संस्कृत में निहित है। उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के विकास की कल्पना संस्कृत के बिना अधूरी है और आज विश्व संस्कृत को भारतीय बौद्धिक धरोहर के रूप में स्वीकार कर रहा है।

उन्होंने विद्यार्थियों का आह्वान करते हुए कहा कि आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत के विशाल साहित्य और ग्रंथ-संपदा में निहित वैज्ञानिक एवं ज्ञानपरक तत्वों की खोज की जाए, ताकि प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक संदर्भों से जोड़ते हुए वर्तमान पीढ़ी के विद्यार्थी उससे अधिकतम लाभ प्राप्त कर सकें।

संस्कृत मन को अनुशासित करने वाली भाषा: डॉ. अनिल मिश्रा
समारोह के विशिष्ट अतिथि सेवानिवृत्त आईपीएस डॉ. अनिल मिश्रा ने संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता, उसकी ध्वनि संरचना, मानवीय चेतना तथा व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर उसके प्रभाव पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने संस्कृत को ऐसी भाषा बताया जो विचारों में स्पष्टता और मन में अनुशासन की भावना विकसित करने में सहायक है। उन्होंने विद्यार्थियों से संस्कृत के अध्ययन को केवल अकादमिक विषय तक सीमित न रखकर उसके व्यापक ज्ञान-विज्ञान और जीवन-दर्शन को समझने का आह्वान किया।

“देववाणी को मिटाया नहीं जा सकता”—कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय
समारोह की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय ने अपने ओजस्वी एवं प्रभावशाली अध्यक्षीय उद्बोधन से सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा और संस्कृत के गौरवपूर्ण इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मैकाले जैसी मानसिकता ने भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को कमजोर करने का सुनियोजित प्रयास किया।

उन्होंने कहा कि उस दौर में अनेक ग्रंथालयों को नष्ट किया गया और ऋषि-मुनियों द्वारा रचित अमूल्य ज्ञान-साहित्य को समाप्त करने के प्रयास किए गए, लेकिन इसके बावजूद संस्कृत आज भी अक्षुण्ण, जीवंत और प्रवाहमान है। उन्होंने कहा कि संस्कृत को समाप्त करने के अनेक प्रयासों के बावजूद यह भाषा आज भी अपने मूल स्वरूप और गौरव के साथ विद्यमान है।

कुलपति ने संस्कृत को देववाणी बताते हुए कहा कि यह केवल शब्दों और व्याकरण की भाषा नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों की ज्ञान-साधना, चिंतन परंपरा और सांस्कृतिक चेतना की संवाहक है। उनके अध्यक्षीय संबोधन में संस्कृत से जुड़े अनेक रोचक, प्रेरक एवं हृदयस्पर्शी प्रसंगों ने विद्यार्थियों को भाव-विभोर कर दिया। उनके वक्तव्य के दौरान सभागार कई बार करतल ध्वनि से गूंज उठा।
समारोह में सारस्वत अतिथि के रूप में देशराज शर्मा उपस्थित रहे।

प्रतियोगिताओं के विजेताओं का सम्मान
संस्कृत सप्ताह के दौरान विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों में निबंध लेखन, श्लोक पाठ, वाद-विवाद, भाषण, प्रश्नोत्तरी सहित विभिन्न प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। समापन समारोह में इन प्रतियोगिताओं में प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राओं को नगद पुरस्कार राशि एवं प्रशस्ति पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। पुरस्कार प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के चेहरों पर उत्साह और उपलब्धि का भाव स्पष्ट दिखाई दिया।

संस्कृतनिष्ठ हिंदी की मिठास ने बांधा समां
कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन विश्वविद्यालय के विद्वान प्राध्यापक प्रोफेसर दामोदर परगाई ने किया। उनके संचालन में संस्कृतनिष्ठ हिंदी की सहजता, गरिमा और मधुरता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उन्होंने कार्यक्रम के विभिन्न चरणों को प्रभावशाली ढंग से जोड़ते हुए पूरे समारोह को जीवंत बनाए रखा।

आभार ज्ञापन प्रोफेसर बिन्दुमती द्विवेदी ने किया। समारोह के अंत में वैदिक परंपरा के अनुरूप शांतिपाठ किया गया, जिसके साथ संस्कृत सप्ताह महोत्सव का विधिवत समापन हुआ।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के समस्त विभागाध्यक्ष, प्राध्यापकगण, कर्मचारी वर्ग तथा बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। पूरे समारोह में संस्कृत के प्रति विद्यार्थियों और शिक्षकों का उत्साह देखते ही बन रहा था।

मुक्त विश्वविद्यालय के सेंटर का भी किया निरीक्षण
समारोह के दौरान उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर नवीन चंद्र लोहनी ने उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय परिसर में संचालित मुक्त विश्वविद्यालय के सेंटर का भी निरीक्षण किया। उन्होंने सेंटर की शैक्षणिक गतिविधियों एवं व्यवस्थाओं की जानकारी ली। इस अवसर पर उनके साथ क्षेत्रीय निदेशक डॉ. बृजेश बनकोटी भी मौजूद रहे।

संस्कृत सप्ताह का यह समापन समारोह केवल एक आयोजन का समापन नहीं, बल्कि संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और उसके वैज्ञानिक एवं ज्ञानपरक पक्ष को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के संकल्प के रूप में भी सामने आया। समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि संस्कृत की प्राचीन ज्ञान-संपदा को आधुनिक शोध और तकनीक से जोड़कर आने वाली पीढ़ियों के लिए नए ज्ञान के द्वार खोले जा सकते हैं।

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