उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थानम् के छठे उपाध्यक्ष के रूप में ग्रहण किया कार्यभार, संस्कृत विद्वानों के सम्मान एवं संरक्षण का लिया संकल्प
हरिद्वार,15 अक्टूबर ।
उत्तराखण्ड में संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन एवं सर्वांगीण विकास को नई दिशा देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए डॉ. नवीन चन्द्र पन्त ने उत्तराखण्ड संस्कृत संस्थानम् के छठे उपाध्यक्ष के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। इस अवसर पर संस्थान के सचिव प्रो. विनय कुमार विद्यालंकार ने संस्थान की ओर से उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया।

कार्यभार ग्रहण करने के पश्चात डॉ. पन्त ने स्पष्ट किया कि उत्तराखण्ड की द्वितीय राजभाषा संस्कृत का सर्वविध विकास उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा। उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन बौद्धिक चेतना की आधारशिला है। इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए समर्पित भाव से कार्य करना समय की आवश्यकता है।
संस्कृत विद्वानों के संघर्षों के रहे हैं साक्षी
डॉ. पन्त ने कहा कि उत्तराखण्ड में संस्कृत भाषा के पुनरुद्धार और उसे उचित सम्मान दिलाने के लिए संस्कृत विद्वानों ने लंबे समय तक संघर्ष किया है। वे स्वयं इस संघर्ष के साक्षी और सहयोगी रहे हैं। उन्होंने संकल्प व्यक्त किया कि संस्कृत भाषा के संरक्षण, प्रचार-प्रसार और विकास के लिए कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान देना तथा उनके प्रयासों को संरक्षण प्रदान करना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहेगा।
उन्होंने संस्कृत के व्यापक प्रचार-प्रसार, विद्वानों के योगदान को उचित पहचान देने तथा प्रदेश में संस्कृत के विकास के लिए सकारात्मक वातावरण तैयार करने की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की।
संस्कृत जगत ने किया स्वागत, दी शुभकामनाएं
इस अवसर पर संस्थान की वित्त अधिकारी श्रीमती माया देवी, शोध अधिकारी डॉ. हरीशचन्द्र गुरुरानी, प्रकाशन अधिकारी किशोरीलाल रतूड़ी एवं प्रशासनिक अधिकारी लीला रावत सहित संस्थान के अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त उत्तराखण्ड के विश्वविद्यालयों, संस्कृत विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के प्राचार्यों, शिक्षकों और संस्कृत प्रेमियों ने भी डॉ. नवीन चन्द्र पन्त का स्वागत करते हुए उन्हें नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं दीं।
डॉ. पन्त के उपाध्यक्ष पद का कार्यभार ग्रहण करने से संस्कृत जगत को भाषा के संरक्षण, विद्वानों के सम्मान और संस्कृत शिक्षा के विस्तार की दिशा में सकारात्मक पहल की उम्मीद है। अब प्रदेश में संस्कृत के विकास से जुड़े प्रयासों को किस प्रकार नई गति मिलती है, इस पर संस्कृत जगत की निगाहें रहेंगी।