चमोली, 14 मई 2026।
नारायण स्वामी आश्रम में “भारतीय ज्ञान परम्परा की ऐतिहासिक भूमि बद्रिकाश्रम धाम” विषय पर आयोजित तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का भव्य शुभारंभ हुआ। यह संगोष्ठी उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, श्री सोबन सिंह जीना विश्वविद्यालय, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय रघुनाथ कीर्ति परिसर तथा श्री अग्निमन्दिर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की जा रही है।

सेमिनार में देश के विभिन्न राज्यों से 350 से अधिक प्रतिभागी, शोध छात्र एवं प्रोफेसर भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि स्वामी बालकनाथ जी महाराज ने कहा कि बद्रिकाश्रम धाम केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि सनातन भारतीय ज्ञान परम्परा का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने कहा कि हिमालय की यह पुण्यभूमि सदियों से ऋषियों, योगियों और तपस्वियों की साधना स्थली रही है, जहाँ से वेद, उपनिषद, योग और अध्यात्म की दिव्य चेतना पूरे विश्व में प्रवाहित हुई।

उन्होंने कहा कि बद्रीनाथ धाम का प्रत्येक कण भारतीय संस्कृति, तप, त्याग और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत है। यही वह भूमि है जहाँ नर-नारायण ने तप किया, वेदव्यास ने महाभारत की रचना की तथा आदि गुरु शंकराचार्य ने सनातन धर्म की पुनर्स्थापना का महान कार्य किया।

संगोष्ठी में केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के देवप्रयाग परिसर के निदेशक प्रोफेसर पी.वी. सुब्रह्मण्यम ने बद्रीनाथ धाम की अलौकिक महिमा एवं रहस्यमयी परम्पराओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बद्रिकाश्रम धाम केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि वैश्विक आध्यात्मिक सभ्यता एवं ज्ञान-विज्ञान का प्राचीन स्रोत रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर रमाकान्त पाण्डेय ने कहा कि “हिमालय की गोद में स्थित यह धाम सदियों से आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र माना जाता है।” उन्होंने बद्रीनाथ धाम से जुड़ी अनेक पौराणिक एवं आध्यात्मिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां आज भी ऋषि परम्परा की सूक्ष्म चेतना विद्यमान है।

बद्रीनाथ होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश मेहता ने कहा कि अलकनंदा तट, तप्तकुण्ड और नारद शिला जैसे पवित्र स्थल भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर हैं।

उद्घाटन सत्र में भारतीय शिक्षा पद्धति, गुरुकुल परम्परा, योग-विज्ञान, पर्यावरण चेतना एवं सनातन जीवन मूल्यों पर गंभीर चर्चा हुई। वैदिक मंत्रोच्चार, मंगलाचरण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय एवं आध्यात्मिक बना दिया।

इस अवसर पर हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. दिनेश पांडेय की पुस्तक “वाक शुद्धि” का भी विमोचन विद्वानों द्वारा किया गया। कार्यक्रम में मुख्य संयोजक डॉ. मनोज विश्नोई ने सेमिनार की रूपरेखा प्रस्तुत की, जबकि संचालन डॉ. प्रदीप सेमवाल ने किया।

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