संस्कृत केवल भाषा नहीं, भारत की ज्ञान-चेतना और चिंतन परंपरा की वाहक : राज्यपाल

हरिद्वार, 27 सितंबर।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार में शनिवार को 12वां दीक्षांत समारोह गरिमापूर्ण माहौल में आयोजित हुआ। समारोह में मुख्य अतिथि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेनि.) ने चार विद्वानों को मानद उपाधियों से सम्मानित किया, जबकि 32 छात्र-छात्राओं को स्वर्ण पदक तथा छह शोधार्थियों को पीएचडी (विद्यावारिधि) की उपाधि प्रदान की गई।

दीक्षांत समारोह की खास बात यह रही कि राज्यपाल ने अपना पूरा संबोधन संस्कृत भाषा में दिया। उन्होंने विद्यार्थियों को ज्ञान, संस्कार, नवाचार और राष्ट्रसेवा को जीवन का आधार बनाने का संदेश देते हुए कहा कि दीक्षांत केवल शिक्षा पूरी होने का अवसर नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति नई जिम्मेदारियों की शुरुआत है।

संस्कृत को भविष्य की तकनीक से जोड़ने पर जोर
राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत को केवल अतीत की धरोहर मानकर संरक्षित करना पर्याप्त नहीं है। इसे भविष्य की संभावनाओं से जोड़ना होगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल तकनीक, भाषा-विज्ञान और मशीन लर्निंग जैसे आधुनिक क्षेत्रों में संस्कृत की वैज्ञानिक संरचना और विशाल साहित्य के आधार पर शोध की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।

उन्होंने कहा कि संस्कृत को पुस्तकालयों की अलमारियों तक सीमित रखने के बजाय डिजिटल दुनिया, शोध प्रयोगशालाओं और वैश्विक ज्ञान-विमर्श तक पहुंचाने की आवश्यकता है। संस्कृत विद्यार्थियों के लिए अध्यापन के साथ-साथ अनुवाद, शोध, भारतीय दर्शन, संस्कृति, प्रकाशन, डिजिटल मीडिया और भाषा-तकनीक जैसे क्षेत्रों में भी नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।

राज्यपाल ने कहा कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारत की ज्ञान-चेतना, चिंतन परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति की प्रमुख वाहक है। वेद, उपनिषद, दर्शन, व्याकरण, आयुर्वेद और योग सहित भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा संस्कृत में सुरक्षित है। संस्कृत व्यक्ति को केवल शब्दों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि, विवेक, कर्तव्यबोध और मानव कल्याण की भावना भी प्रदान करती है।

विद्यार्थियों को दिए पांच संकल्प
राज्यपाल ने उपाधि एवं स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को बधाई देते हुए उनसे पांच संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थी ज्ञान को निरंतर बढ़ाएं, संस्कारों को जीवन में उतारें, समाज की सेवा करें, नवाचार को अपनाएं और राष्ट्र को सर्वोपरि रखें।

उन्होंने कहा कि युवा शक्ति के पास ज्ञान, संस्कार और ऊर्जा तीनों हैं। इन तीनों को समाज की आवश्यकताओं से जोड़कर सार्थक बनाना विद्यार्थियों की जिम्मेदारी है।

चार विद्वानों को मानद उपाधि
समारोह में राज्यपाल ने लोक गायिका पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़थ्वाल, डॉ. अनुसूया प्रसाद पंत, प्रो. राम कुमार शर्मा तथा श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय को मानद उपाधियों से सम्मानित किया।

मानद उपाधि प्राप्त करने वालों में प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय को महामहोपाध्याय, प्रो. राम कुमार शर्मा एवं आचार्य अनुसूया प्रसाद पंत को विद्यावाचस्पति (डी.लिट.) तथा पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़थ्वाल को कलाश्री की उपाधि प्रदान की गई।

छह शोधार्थियों को पीएचडी की उपाधि
दीक्षांत समारोह में छह शोधार्थियों को पीएचडी (विद्यावारिधि) की उपाधि प्रदान की गई। इनमें शैलेंद्र बहुगुणा एवं अभिषेक परगांई को साहित्य, अमित प्रकाश बंदौलिया को साहित्य, अरुण ममगांई, जसुदेव तथा आशुतोष काला को व्याकरण विषय में शोध के लिए उपाधि प्रदान की गई।

32 विद्यार्थियों को मिले स्वर्ण पदक
सत्र 2024-25 में स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में अरुण कुमार (शास्त्री), अभिषेक बधानी, केशव अवस्थी, भास्करचंद नैनवाल, शिवप्रसाद, पुनीत कुमार, जितेंद्र उनियाल, कमल ओझा, गौरव जगूड़ी, स्वामी रमतानंद, मोहम्मद शोएब, वंश शर्मा, स्वप्निल यादव, अनुज कुमार, आफरीन बानो और गगनदीप गुरागाई शामिल रहे।

वहीं सत्र 2025-26 में सचिन पालीवाल, आयुष मिश्रा, गिरीश भद्री, अशोक कुमार काफले, देवेश सती, संजीव कुमार शर्मा, बलबीर सारस्वत, आशीष भदौला, कु. ऋतिका, स्वामी सकृपा नंदा, आयशा, मौ. रईस अहमद, राजकुमार कुश, खुशबू, नईम अहमद और जगदीश चंद्र पाण्डेय को स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।

संस्कृत को शोध और रोजगार से जोड़ने की जरूरत : धन सिंह रावत
विशिष्ट अतिथि संस्कृत शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कहा कि संस्कृत वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत भाषा है और इसमें जीवन विकास की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि संस्कृत की शब्द-संपदा का प्रभाव अनेक भारतीय भाषाओं पर दिखाई देता है।

उन्होंने उम्मीद जताई कि उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी पहचान बनाएगा और विश्व के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के साथ शोध एवं ज्ञान का आदान-प्रदान बढ़ेगा।

नई पीढ़ी की भागीदारी से होगा संस्कृत का विस्तार
संस्कृत शिक्षा सचिव दीपक कुमार ने कहा कि संस्कृत का उत्थान केवल सरकारी प्रयासों से संभव नहीं है। विश्वविद्यालय शिक्षा, शोध और अनुसंधान के नए आयाम खोल सकते हैं, लेकिन संस्कृत को जन-जन तक पहुंचाने के लिए समाज और नई पीढ़ी की भागीदारी आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत की विरासत को सुरक्षित रखने के साथ इसे नवाचार और आधुनिक तकनीक से जोड़ना समय की आवश्यकता है। उन्होंने संस्कृत विद्यार्थियों से संस्कृत को अपने जीवन की ज्ञान-यात्रा का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।

दुर्लभ ग्रंथों से समृद्ध होगी विश्वविद्यालय की ज्ञान-संपदा
कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने विश्वविद्यालय के विभिन्न प्रकाशनों का विमोचन भी किया। उन्होंने लगभग 10 हजार दुर्लभ पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं का विश्वविद्यालय को दान करने के लिए पद्मश्री अभिराज राजेन्द्र मिश्र के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया।

राज्यपाल ने कहा कि इन दुर्लभ ग्रंथों को ‘अभिराज-पुस्तक-वीथी’ के रूप में संरक्षित किया जाना आने वाली पीढ़ियों के लिए महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा सिद्ध होगा।

संस्कृत विश्वविद्यालय को आधुनिक ज्ञान का केंद्र बनाने की दिशा
कुलपति प्रो. रमाकांत पाण्डेय ने स्वागत भाषण में विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं शोध उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का प्रमुख उद्देश्य संस्कृत भाषा, भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध को आगे बढ़ाना है। इसी उद्देश्य से परंपरागत विषयों के साथ आधुनिक विषयों को भी अध्ययन एवं अनुसंधान से जोड़ा गया है।

उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय का लक्ष्य संस्कृत को केवल परंपरा तक सीमित रखने के बजाय उसे शोध, शिक्षा और समाजोपयोगी ज्ञान का प्रभावी माध्यम बनाना है।

समारोह में प्राग्ज्योतिषपुर विश्वविद्यालय, गुवाहाटी के कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी, पूर्व कुलपति प्रो. रमेश कुमार पाण्डेय, जिलाधिकारी मयूर दीक्षित, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नवनीत सिंह भुल्लर, उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकांत पाण्डेय सहित कार्यपरिषद एवं विद्या परिषद के सदस्य, जनप्रतिनिधि, शिक्षकगण और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं मौजूद रहे।

दीक्षांत समारोह ने यह संदेश स्पष्ट किया कि संस्कृत की शक्ति केवल उसकी प्राचीनता में नहीं, बल्कि उसे आधुनिक शोध, तकनीक, रोजगार और वैश्विक ज्ञान-विमर्श से जोड़ने की क्षमता में भी है।

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