कुंभ हो या अर्धकुंभ यह आयोजन है संत तो किसी भी श्रद्धालु के समागम का इंतज़ार करता है क्योंकि भक्त भगवान का श्रद्धालु संत का और सभी मिलकर कुंभ जैसे आयोजन का दर्शन पाना चाहते है एक बात इसमें अहम है की यदि शासन प्रशासन ही सनातन के आयोजन को प्राथमिकता के तोर पर भव्य बनाना चाहता है तो यह उत्सव संतो के लिए किसी बड़े समारोह से कम नहीं है
सही बात तो यह की संत श्रद्धालुओं के भूखे होते है और अनुष्ठान किसी एक से नहीं बल्कि सर्व समाज और तिनकी मात्र के सहयोग से भी पूरा होता है बीते वर्षो में जब नागा सन्यास परंपरा में आया तो इसमें एक दो नहीं बल्कि कई अर्धकुंभ और पूर्ण कुंभ का दर्शन किया श्रद्धालु साल बढ़ते जा रहे है इसमें युवाओ की भूमिका सर्वाधिक बड़ी है