बिजनौर से लखनऊ तक चर्चाओं का बाजार गर्म, BJP-SP-BSP के बीच बढ़ी दलित मतदाताओं को साधने की कवायद…
लखनऊ/बिजनौर, 11 सितम्बर ।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बैंक एक बार फिर केंद्र में आता दिखाई दे रहा है। भारतीय जनता पार्टी (BJP), समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) जहां दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं, वहीं आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद के राजनीतिक उभार ने इस मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है।
नगीना लोकसभा सीट से चंद्रशेखर आजाद की जीत ने उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में एक नए राजनीतिक केंद्र की संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज कर दी थी। उनकी सफलता के बाद यह सवाल लगातार उठता रहा है कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का पारंपरिक समीकरण आने वाले विधानसभा चुनाव में किसी नए रूप में सामने आएगा।
इसी बीच रोहिणी घावरी की भारत वापसी ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चाओं को नई दिशा दे दी है। इंदौर से ताल्लुक रखने वाली रोहिणी घावरी का नाम पिछले कुछ समय से दलित मुद्दों और चंद्रशेखर आजाद से जुड़े विवादों के कारण सार्वजनिक चर्चा में रहा है। उनके भारत लौटने के बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा है कि उनकी सक्रियता आने वाले समय में दलित समाज से जुड़े विमर्श को किस दिशा में ले जाएगी।
सफाई कर्मचारी परिवार से विदेश तक का सफर
रोहिणी घावरी की व्यक्तिगत यात्रा भी चर्चा का विषय रही है। वह इंदौर के एक सफाई कर्मचारी परिवार से आती हैं और वर्ष 2019 में छात्रवृत्ति के माध्यम से उच्च शिक्षा के लिए स्विट्जरलैंड गई थीं। विदेश में शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनकी सार्वजनिक गतिविधियों और दलित समाज से जुड़े मुद्दों पर उनकी मुखरता ने उन्हें सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में पहचान दिलाई।
उनके नाम को लेकर समय-समय पर चंद्रशेखर आजाद पर लगाए गए विभिन्न आरोपों और उनसे जुड़े विवाद भी सार्वजनिक चर्चा में रहे हैं। हालांकि इन आरोपों को लेकर संबंधित पक्षों के अपने-अपने दावे हैं और किसी भी आरोप को अंतिम सत्य मानने से पहले आधिकारिक तथ्यों और संबंधित पक्षों के बयान को देखना जरूरी होगा।
दलित वोट पर किसकी नजर?
उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में दलित मतदाता लंबे समय से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। मायावती के नेतृत्व में BSP ने लंबे समय तक दलित राजनीति का मजबूत आधार तैयार किया। वहीं BJP ने पिछले वर्षों में दलित समुदाय के बीच अपनी राजनीतिक पहुंच बढ़ाने के लिए विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक रणनीतियां अपनाई हैं। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी भी सामाजिक गठजोड़ को विस्तार देने की दिशा में लगातार प्रयास करती रही है।
ऐसे माहौल में चंद्रशेखर आजाद का उभार इस मुकाबले में एक अलग आयाम जोड़ता है। खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी राजनीतिक सक्रियता और नगीना की जीत के बाद दलित युवाओं के बीच उनके प्रभाव को लेकर राजनीतिक विश्लेषण तेज हुआ है।
बिजनौर से लखनऊ तक क्यों बढ़ी चर्चा?
बिजनौर और आसपास का पश्चिमी उत्तर प्रदेश क्षेत्र दलित राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। नगीना लोकसभा क्षेत्र में चंद्रशेखर आजाद की जीत ने इस क्षेत्र को राष्ट्रीय राजनीतिक चर्चा के केंद्र में ला दिया था। अब रोहिणी घावरी की भारत वापसी के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक चर्चाएं फिर तेज हैं।
हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रोहिणी घावरी आने वाले समय में किसी राजनीतिक दल या संगठन के साथ औपचारिक रूप से सक्रिय भूमिका निभाएंगी अथवा सामाजिक मुद्दों तक ही सीमित रहेंगी। लेकिन उनकी वापसी ने इतना जरूर कर दिया है कि दलित राजनीति से जुड़े मुद्दों पर नई बहस शुरू हो गई है।
आने वाले चुनाव में क्या होगा असर?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले दलित मतदाताओं को साधने की कोशिशें आने वाले महीनों में और तेज होने की संभावना है। राजनीतिक दलों के सामने केवल पारंपरिक वोट बैंक को बनाए रखने की चुनौती नहीं होगी, बल्कि युवा मतदाताओं, रोजगार, शिक्षा, सामाजिक सम्मान और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों पर भी भरोसा कायम करना होगा।
ऐसे में रोहिणी घावरी की सार्वजनिक सक्रियता और चंद्रशेखर आजाद की राजनीति—दोनों ही आने वाले समय में दलित विमर्श को प्रभावित करने वाले कारक बन सकते हैं। फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है, लेकिन बिजनौर से लखनऊ तक एक बात स्पष्ट है—उत्तर प्रदेश में दलित वोट बैंक को लेकर सियासी जंग अब और तेज होती दिखाई दे रही है।