उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति को ‘अन्य राज्य श्रेणी’ में मिला सम्मान, संस्कृत भाषा-साहित्य के क्षेत्र में चार दशक की साधना को मिली राष्ट्रीय पहचान
हरिद्वार, 11 सितंबर 2026।
देवभूमि उत्तराखंड के लिए यह गौरव और हर्ष का अवसर है। संस्कृत भाषा, साहित्य, दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय को महाराष्ट्र शासन के उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग द्वारा प्रदान किए जाने वाले प्रतिष्ठित ‘महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार’ के लिए चयनित किया गया है।
महाराष्ट्र शासन की चयन समिति की अनुशंसा के बाद बुधवार को वर्ष के कालिदास पुरस्कारों की सूची जारी की गई। इसमें ‘अन्य राज्य श्रेणी (Other State Category)’ के अंतर्गत प्रो. पाण्डेय का चयन किया गया है। संस्कृत के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी दीर्घकालीन साधना, शोध, लेखन, अध्यापन और भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने के उनके प्रयासों को इस सम्मान के माध्यम से व्यापक राष्ट्रीय पहचान मिली है।
यह सम्मान केवल किसी एक विद्वान की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उत्तराखंड की संस्कृत परंपरा, संस्कृत शिक्षा और भारतीय शास्त्रीय ज्ञान-विरासत के राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान के रूप में देखा जा रहा है।
31 वर्षों का अध्यापन, शोध और संस्कृत साधना का लंबा सफर
प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने अपने शैक्षणिक जीवन में अध्यापन एवं शोध के क्षेत्र में लगभग 31 वर्षों का अनुभव अर्जित किया है, जिसमें 14 वर्ष से अधिक समय उन्होंने प्रोफेसर के रूप में सेवाएं दी हैं। इसके साथ ही उनके पास लगभग 15 वर्षों का प्रशासनिक अनुभव भी है।
उन्होंने शिक्षा के साथ-साथ शोध को अपनी साधना का प्रमुख माध्यम बनाया। उनके निर्देशन में 25 शोधार्थियों को पीएच.डी. उपाधि प्राप्त हो चुकी है, जबकि 8 शोधार्थी वर्तमान में शोध कार्य कर रहे हैं।
उनका अकादमिक योगदान उनके व्यापक लेखन से भी स्पष्ट होता है। प्रो. पाण्डेय द्वारा 65 ग्रंथों का लेखन, 150 शोध पत्रों का प्रकाशन तथा 22 साहित्यिक लेखों का प्रकाशन किया जा चुका है। इसके अलावा वे 7 शोध पत्रिकाओं के संपादन से भी जुड़े रहे हैं।
देश-विदेश में संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रतिनिधित्व
प्रो. पाण्डेय ने संस्कृत को केवल कक्षा और शोध तक सीमित रखने के बजाय राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने का कार्य किया है। वे 86 राष्ट्रीय संगोष्ठियों, 15 अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों और 57 कार्यशालाओं में सहभागिता कर चुके हैं।
थाईलैंड, लंदन, आयरलैंड और नेपाल सहित विभिन्न देशों में उन्होंने भारत तथा संस्कृत की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिनिधित्व किया। उनकी विद्वत्ता का प्रभाव इस बात से भी परिलक्षित होता है कि उनकी 27 पुस्तकें देश के विभिन्न केंद्रीय एवं राज्य विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में निर्धारित हैं।
लुप्त होती टीका लेखन परंपरा को दिया नया जीवन
प्रो. रमाकान्त पाण्डेय की विद्वत्ता का एक महत्वपूर्ण पक्ष पारंपरिक टीका लेखन परंपरा के पुनरुज्जीवन से जुड़ा है। संस्कृत की यह परंपरा धीरे-धीरे सीमित होती जा रही थी, लेकिन प्रो. पाण्डेय ने दुर्लभ संस्कृत ग्रंथों और रचनाओं पर विद्वत्तापूर्ण टीकाएं लिखकर इस परंपरा को नई ऊर्जा प्रदान की।
उन्होंने महाकवि गंगाधर शास्त्री कृत ‘अलिविलासिसंलाप’, पंडित गोकुलनाथ कृत ‘शिवशतक’ तथा आचार्य अभिनवगुप्त के दुर्लभ स्तोत्रों पर गहन अध्ययन एवं टीका लेखन किया है। उनके इस कार्य की संस्कृत जगत के विद्वानों द्वारा सराहना की गई है।
छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान
प्रो. पाण्डेय की प्रतिभा को छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलती रही है। मध्य प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा उन्हें शास्त्रार्थ और संस्कृत लेखन के क्षेत्र में अखिल भारतीय स्तर पर दो बार ‘नवोदित प्रतिभा सम्मान’ से सम्मानित किया गया।
इसके अलावा उन्हें एक लाख रुपये का प्रतिष्ठित ‘संस्कृत गौरव पुरस्कार’ सहित लगभग एक दर्जन राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। अब तक उन्हें 14 राज्य स्तरीय एवं राष्ट्रीय सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
कुलपति के रूप में संस्कृत शिक्षा को आधुनिक तकनीक से जोड़ने की पहल
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में प्रो. पाण्डेय ने परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। उनके कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (NEP-2020) के क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया गया।
विशेष रूप से कर्मकांड और ज्योतिष जैसे पारंपरिक विषयों के साथ अनुवाद विज्ञान तथा संस्कृत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसे आधुनिक एवं भविष्यपरक पाठ्यक्रमों को जोड़ने की पहल को संस्कृत शिक्षा के बदलते स्वरूप के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस पहल के माध्यम से संस्कृत को केवल प्राचीन भाषा के रूप में देखने के बजाय उसे नई शिक्षा व्यवस्था, तकनीक, शोध और रोजगारोन्मुख संभावनाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया है।
उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय परिवार में खुशी की लहर
महाराष्ट्र शासन द्वारा प्रतिष्ठित सम्मान के लिए प्रो. रमाकान्त पाण्डेय के चयन की घोषणा के बाद उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय परिवार में हर्ष का माहौल है। विश्वविद्यालय के शिक्षकों, अधिकारियों, कर्मचारियों और छात्र-छात्राओं ने कुलपति को इस उपलब्धि के लिए बधाई दी है।
प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, संस्कृत अकादमी से जुड़े विद्वानों तथा देशभर के संस्कृत जगत से भी प्रो. पाण्डेय को शुभकामनाएं प्राप्त हो रही हैं।
व्यक्तिगत उपलब्धि से आगे, उत्तराखंड की संस्कृत विरासत का सम्मान
प्रो. रमाकान्त पाण्डेय को मिला यह सम्मान उनकी वर्षों की तपस्या, अध्ययन, अध्यापन, शोध और लेखन की राष्ट्रीय स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। साथ ही यह उपलब्धि उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय की अकादमिक प्रतिष्ठा और देवभूमि की समृद्ध संस्कृत परंपरा को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान देने वाली है।
महाराष्ट्र शासन के प्रतिष्ठित ‘महाकवि कालिदास संस्कृत साधना पुरस्कार’ के लिए प्रो. पाण्डेय का चयन यह संदेश भी देता है कि संस्कृत केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के ज्ञान, शोध, तकनीक और भविष्य की शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकती है।
उत्तराखंड के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है क्योंकि देवभूमि की धरती से संस्कृत साधना की जिस परंपरा को सदियों से पोषण मिलता आया है, उसी परंपरा के एक समर्पित विद्वान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित सम्मान मिलना पूरे प्रदेश के लिए गर्व का विषय है।