1997 में सरकारी नीलामी के जरिए खरीदा था सिनेमा घर, बीएचईएल के नोटिस के बाद बढ़ा विवाद; जमीन के दस्तावेज दिखाकर प्रशासन से मांगा न्याय

हरिद्वार, 27 अक्टूबर।
पायल सिनेमा घर के मालिकाना हक को लेकर विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्ष 1997 में सरकारी नीलामी प्रक्रिया के तहत 36 लाख रुपये में पायल सिनेमा घर खरीदने का दावा कर रहे अरुण चौहान ने प्रेस क्लब हरिद्वार में आयोजित पत्रकार वार्ता में अपने संघर्ष की पूरी कहानी बयां की। उन्होंने आरोप लगाया कि नीलामी की पूरी धनराशि जमा करने और वर्षों तक सिनेमा का संचालन करने के बावजूद उन्हें संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिल पाया। अब बीएचईएल की ओर से जारी बेदखली के नोटिस ने उनके सामने नई कानूनी और प्रशासनिक चुनौती खड़ी कर दी है। अरुण चौहान ने प्रशासन से जमीन के दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच कर उन्हें न्याय दिलाने की मांग की है।

36 लाख रुपये की नीलामी, फिर भी मालिकाना हक पर सवाल
पत्रकार वार्ता में अरुण चौहान ने बताया कि पायल सिनेमा घर को उनके परिवार ने उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम की नीलामी प्रक्रिया के तहत खरीदा था। उनके अनुसार, वर्ष 1997 में 36 लाख रुपये की बोली लगाकर संपत्ति हासिल की गई थी। नीलामी की प्रक्रिया के दौरान विज्ञप्ति भी समाचार पत्रों में प्रकाशित की गई थी और निर्धारित धनराशि सरकार के पास जमा कराई गई थी।

अरुण चौहान ने पत्रकारों के समक्ष एग्रीमेंट, नीलामी से संबंधित दस्तावेज और जमीन के अभिलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि उनके परिवार ने संपत्ति को हासिल करने के लिए अपनी जमीन तक बेच दी थी। उनका कहना है कि जब भुगतान में कठिनाई होती थी, तब राजस्व वसूली के लिए अमीन तक पहुंच जाता था और धनराशि जमा करने का दबाव बनाया जाता था। ऐसे में अब संपत्ति पर अधिकार को लेकर विवाद खड़ा होना उनके लिए गंभीर परेशानी का विषय है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति ने सरकारी प्रक्रिया के तहत संपत्ति खरीदने के लिए निर्धारित रकम जमा की है, तो उसके अधिकारों का निस्तारण भी नियमानुसार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि नीलामी के बाद कब्जा मिलने और वर्षों तक सिनेमा संचालित करने के बावजूद मालिकाना हक का मामला लंबित रहना उनके परिवार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

बीएचईएल की भूमिका और पानी-बिजली की सुविधा का मामला
अरुण चौहान ने बताया कि जब उनके परिवार ने पायल सिनेमा का संचालन शुरू किया, तब परिसर में बुनियादी सुविधाओं की कमी थी। उनके अनुसार, बाद में उन्हें जानकारी मिली कि इस स्थान पर बीएचईएल को कस्टोडियन की जिम्मेदारी दी गई थी और परिसर के संचालन के लिए पानी की सुविधा उपलब्ध कराने की भूमिका भी उसकी थी।

उन्होंने आरोप लगाया कि शुरुआत में बीएचईएल से पानी और बिजली की मांग करने के बावजूद उन्हें ये सुविधाएं नहीं मिलीं। उनका दावा है कि करीब एक वर्ष तक बिना पानी और बिजली की समुचित व्यवस्था के सिनेमा चलाने का प्रयास किया गया।

अरुण चौहान के मुताबिक, तत्कालीन जिलाधिकारी सुदांशु जी के हस्तक्षेप के बाद पानी की सुविधा उपलब्ध हो सकी। उन्होंने बताया कि जिलाधिकारी ने सामुदायिक स्थल पर पानी की सुविधा उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया था। इसके बाद पानी का कनेक्शन मिला, जो उनके अनुसार आज भी चला आ रहा है। वहीं, बिजली का कनेक्शन उन्हें हाइडल विभाग से प्राप्त हुआ।

उन्होंने कहा कि इसके बाद उनके परिवार ने लंबे समय तक सिनेमा का संचालन किया और लोगों के मनोरंजन के लिए अपनी सेवाएं दीं।

2016 के बाद कारोबार में गिरावट, स्वेच्छा से सरेंडर किया लाइसेंस
अरुण चौहान ने बताया कि वर्ष 2016 के आसपास सिनेमा कारोबार में गिरावट आने लगी थी। मल्टीप्लेक्स और मॉल संस्कृति के विस्तार के साथ पारंपरिक सिनेमा घरों के व्यवसाय पर असर पड़ा। उनके अनुसार, हरिद्वार क्षेत्र में भी कई सिनेमा हॉल बंद हो गए और पायल सिनेमा को भी लगातार घाटे का सामना करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि आर्थिक परिस्थितियों के चलते उन्हें भी सिनेमा बंद करने का निर्णय लेना पड़ा। अरुण चौहान के मुताबिक, उनका परिवार राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा रहा है और सिनेमा बंद करने के बाद वह अपने परिवार के साथ अन्य गतिविधियों में जुड़ गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि सिनेमा बंद करने के बाद उन्होंने स्वेच्छा से लाइसेंस सरेंडर किया था।

उनका आरोप है कि सिनेमा बंद होने के बाद बीएचईएल की ओर से संपत्ति खाली करने का नोटिस जारी किया गया। वर्ष 2017 में नोटिस मिलने पर उन्होंने सवाल उठाया कि जब संपत्ति की नीलामी हुई थी और उस समय कब्जा सौंपा गया था, तब बीएचईएल की ओर से आपत्ति क्यों नहीं की गई।

जमीन के दस्तावेजों को बताया विवाद का अहम आधार
पत्रकार वार्ता के दौरान अरुण चौहान ने भूमि एवं राजस्व अधिकारी कार्यालय से प्राप्त दस्तावेजों का हवाला देते हुए जमीन के हस्तांतरण के इतिहास पर सवाल उठाए। उनके दावे के अनुसार, संबंधित जमीन उत्तर प्रदेश शासन के औद्योगिक विकास विभाग से जुड़ी थी और इसे सरकारी स्तर पर उत्तर प्रदेश चलचित्र निगम को उपलब्ध कराया गया था।

उन्होंने दावा किया कि जमीन से संबंधित अभिलेखों में धनराशि जमा कराने और भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया का उल्लेख है। उनके अनुसार, संबंधित निगम की ओर से उस समय के सर्किल रेट के आधार पर निर्धारित राशि जमा कराई गई थी। उन्होंने इन दस्तावेजों को अपने पक्ष के समर्थन में महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि पूरे मामले को केवल वर्तमान दावों के आधार पर नहीं, बल्कि जमीन के मूल अभिलेखों और सरकारी आदेशों के आधार पर देखा जाना चाहिए।

अरुण चौहान ने यह भी सवाल उठाया कि यदि जमीन को लेकर बीएचईएल की कोई आपत्ति या दावा था, तो नीलामी के समय उसे सामने क्यों नहीं रखा गया। उनका आरोप है कि संपत्ति का मूल्य बढ़ने के बाद विवाद खड़ा किया जा रहा है। हालांकि, जमीन के स्वामित्व, हस्तांतरण की कानूनी प्रकृति और संबंधित संस्थाओं के अधिकारों का अंतिम निर्धारण आधिकारिक अभिलेखों तथा सक्षम न्यायालय के निर्णय के आधार पर ही हो सकेगा।

अदालत से स्टे मिलने के बाद भी कार्रवाई की कोशिश का आरोप
अरुण चौहान ने पत्रकारों को बताया कि बेदखली के नोटिस के खिलाफ उन्होंने न्यायालय की शरण ली थी और उन्हें स्टे मिला था। उनका आरोप है कि इसके बावजूद उन्हें परिसर खाली कराने के लिए पुलिस बल के इस्तेमाल की आशंका का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया कि एक अवसर पर वह स्वयं मौके पर पहुंचे और पुलिस अधिकारी को न्यायालय के आदेश तथा नीलामी से जुड़े दस्तावेज दिखाए। उनके अनुसार, पुलिस अधिकारी ने दस्तावेज देखने के बाद बलपूर्वक कार्रवाई नहीं की।

अरुण चौहान ने इस पूरे घटनाक्रम को अपने परिवार के लिए बेहद तनावपूर्ण बताते हुए कहा कि लंबे समय से चल रहे विवाद के कारण उन्हें मानसिक और शारीरिक परेशानी का सामना करना पड़ा है। उन्होंने दावा किया कि उन्हें कई बार परेशान किया गया और संपत्ति से बेदखल करने के प्रयास किए गए। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना आवश्यक है।

डीएम से भी की मुलाकात, दस्तावेजों की जांच की मांग
अरुण चौहान के मुताबिक, उन्होंने हाल ही में जिलाधिकारी से मुलाकात कर जमीन और नीलामी से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। उनका कहना है कि प्रशासन से उन्हें संबंधित रिपोर्ट और नीलामी की पत्रावली भी प्राप्त हुई है। अब वह चाहते हैं कि सभी दस्तावेजों का निष्पक्ष परीक्षण किया जाए और यह स्पष्ट किया जाए कि संपत्ति के स्वामित्व तथा कब्जे को लेकर उनका कानूनी अधिकार क्या है।

उन्होंने प्रेस को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ बताते हुए मीडिया के माध्यम से अपनी बात शासन-प्रशासन तक पहुंचाने की अपील की। उनका कहना है कि उन्होंने सरकारी नीलामी पर भरोसा करके अपनी पूंजी लगाई थी और अब वह चाहते हैं कि इस पूरे मामले का कानूनी और प्रशासनिक समाधान निकले।

क्या है अरुण चौहान की मांग?
अरुण चौहान ने मांग की है कि पायल सिनेमा की नीलामी, भूमि हस्तांतरण, भुगतान, कब्जे और बेदखली के नोटिस से संबंधित सभी दस्तावेजों की जांच की जाए। साथ ही, बीएचईएल और संबंधित विभागों की भूमिका स्पष्ट की जाए तथा नियमानुसार उनके संपत्ति संबंधी अधिकारों का निस्तारण किया जाए।

अब अहम सवाल यह है कि 1997 की नीलामी के दस्तावेजों, भूमि के मूल अभिलेखों और न्यायालय में चल रही कार्यवाही के आधार पर पायल सिनेमा के मालिकाना हक का विवाद कब सुलझेगा। इस मामले में बीएचईएल, संबंधित सरकारी विभागों और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना महत्वपूर्ण होगा, ताकि पूरे प्रकरण की तस्वीर स्पष्ट हो सके।

नोट: यह समाचार अरुण चौहान द्वारा पत्रकार वार्ता में दिए गए बयान और उनके बताए दस्तावेजों पर आधारित है। संपत्ति के स्वामित्व तथा संबंधित संस्थाओं के अधिकारों पर अंतिम निष्कर्ष के लिए मूल अभिलेखों, न्यायालय के आदेशों और सभी संबंधित पक्षों के आधिकारिक पक्ष का परीक्षण आवश्यक है।

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