गढ़वाल विश्वविद्यालय के नतीजों ने छेड़ी नई राजनीतिक बहस, भाजपा के मजबूत क्षेत्र में बदले छात्र राजनीति के समीकरण…
श्रीनगर गढ़वाल, 13 सितम्बर ।
उत्तराखंड की राजनीति में छात्रसंघ चुनावों को लंबे समय से युवा मतदाताओं के रुझान और भविष्य की राजनीतिक दिशा के एक महत्वपूर्ण संकेतक के तौर पर देखा जाता रहा है। ऐसे में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के बिड़ला परिसर और पौड़ी परिसर में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के कमजोर प्रदर्शन ने प्रदेश की सियासत में नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
हालांकि छात्रसंघ चुनाव के नतीजों को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव का पैमाना मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन भाजपा के प्रभाव वाले गढ़वाल क्षेत्र में छात्र राजनीति के बदले समीकरण निश्चित रूप से राजनीतिक दलों के लिए गंभीर संदेश लेकर आए हैं।
बिड़ला परिसर में ABVP को करारी शिकस्त
बिड़ला परिसर में अध्यक्ष पद पर जय हो ग्रुप के हिमांशु भंडारी ने ABVP के प्रत्याशी भुवन चमोली को करीब 1500 मतों के बड़े अंतर से हराकर शानदार जीत दर्ज की। यह अंतर केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि परिसर में छात्र राजनीति के बदलते रुझान का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
सचिव पद पर NSUI के मयंक बहुगुणा ने ABVP के पंकज को मात देकर संगठन की वापसी दर्ज कराई। उपाध्यक्ष पद पर छात्रम् के पुलकित अग्रवाल विजयी रहे, जबकि सह-सचिव पद निर्दलीय प्रत्याशी के खाते में गया। कोषाध्यक्ष पद पर रामरूप गुर्जर निर्विरोध निर्वाचित हुए।
पौड़ी परिसर में भी NSUI का दबदबा
गढ़वाल विश्वविद्यालय के पौड़ी परिसर से भी ABVP के लिए राहत भरी तस्वीर सामने नहीं आई। यहां NSUI ने अध्यक्ष, सचिव और कोषाध्यक्ष सहित प्रमुख पदों पर अपना कब्जा जमाया।
पौड़ी गढ़वाल को भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में गिना जाता है। जिले की विधानसभा सीटों पर भाजपा का मजबूत राजनीतिक आधार रहा है। ऐसे में विश्वविद्यालय के परिसरों में ABVP के कमजोर प्रदर्शन ने इस सवाल को जन्म दिया है कि क्या गढ़वाल के युवाओं के बीच राजनीतिक सोच में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिल रहा है?
भाजपा के लिए चेतावनी या सिर्फ कैंपस का स्थानीय समीकरण?
इस परिणाम को भाजपा के लिए सीधे राजनीतिक नुकसान के रूप में देखना जल्दबाजी होगी। छात्रसंघ चुनावों की अपनी अलग राजनीति होती है। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, छात्र समस्याएं, स्थानीय समीकरण, संगठन की सक्रियता और व्यक्तिगत संपर्क अक्सर किसी भी बड़े राजनीतिक दल की विचारधारा से ज्यादा प्रभाव डालते हैं।
विधानसभा चुनाव का गणित इससे कहीं व्यापक होता है। 2027 में बेरोजगारी, विकास, महंगाई, पलायन, स्थानीय मुद्दे, सरकार के कामकाज, प्रत्याशियों की छवि, सामाजिक समीकरण और राष्ट्रीय राजनीतिक माहौल जैसे कई कारक मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करेंगे।
फिर भी इन चुनाव परिणामों को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी राजनीतिक दलों के लिए आसान नहीं होगा।
छात्र राजनीति से निकलते हैं भविष्य के राजनीतिक चेहरे
गढ़वाल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का उत्तराखंड की मुख्यधारा की राजनीति से पुराना संबंध रहा है। छात्रसंघों से निकले अनेक युवा आगे चलकर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय हुए हैं।
यही वजह है कि विश्वविद्यालय परिसरों में युवाओं की राजनीतिक पसंद को राजनीतिक दल भविष्य की राजनीति के लिए ग्राउंड लेवल फीडबैक के रूप में देखते हैं।
इस बार ABVP की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति और NSUI व अन्य छात्र संगठनों की सफलता ने भाजपा के छात्र संगठन के सामने कैंपस कनेक्ट मजबूत करने की चुनौती जरूर खड़ी की है। वहीं विपक्षी खेमे के लिए यह परिणाम मनोबल बढ़ाने वाला साबित हो सकता है।
क्या 2027 में दिखाई देगा इसका असर?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या विश्वविद्यालय परिसरों में दिखाई दिया यह बदलाव 2027 के विधानसभा चुनाव में भी नजर आएगा?
इसका जवाब अभी किसी निश्चित निष्कर्ष के साथ देना संभव नहीं है। छात्रसंघ चुनावों में जिस तरह स्थानीय प्रत्याशी और कैंपस के मुद्दे निर्णायक होते हैं, विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह अलग हो सकती है।
लेकिन एक बात स्पष्ट है कि गढ़वाल विश्वविद्यालय के चुनाव परिणामों ने राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर जरूर किया है कि युवा मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ कितनी मजबूत है और आने वाले समय में युवाओं के मुद्दों को लेकर उनकी रणनीति क्या होगी।
2027 की लड़ाई से पहले मिला राजनीतिक संकेत
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अभी राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं हुई है। लेकिन गढ़वाल विश्वविद्यालय के परिणामों ने एक ऐसा राजनीतिक संकेत जरूर दिया है, जिसे भाजपा और कांग्रेस दोनों नजरअंदाज नहीं कर सकते।
ABVP के लिए यह आत्ममंथन का समय है, जबकि NSUI और अन्य विपक्षी छात्र संगठनों के लिए इस जीत को व्यापक युवा समर्थन में बदलने की चुनौती है।
फिलहाल छात्रसंघ चुनावों का यह परिणाम न तो 2027 का फैसला है और न ही किसी दल की जीत-हार की भविष्यवाणी। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि गढ़वाल के विश्वविद्यालय परिसरों में राजनीतिक समीकरणों में हलचल शुरू हो चुकी है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि यह हलचल सिर्फ कैंपस तक सीमित रहती है या 2027 में गढ़वाल की विधानसभा सीटों पर युवा मतदाताओं के रुख में भी इसका असर दिखाई देता है।