2 साल 10 महीने की है बच्ची, पेरेंट्स के दीक्षा लेने के फैसले के बाद ऐसी है जिंदगी
चित्तौड़गढ़

  • चित्तौड़गढ़.मध्यप्रदेश में नीमच के यंग बिजनेसमैन सुमित और उनकी पत्नी अनामिका शनिवार को सूरत में दीक्षा लेने वाले थे। सुमित को दीक्षा मिल गई लेकिन अनामिका की दीक्षा कानूनी अड़चनों के कारण रुक गई। 2 साल दस महीने की उनकी बेटी है, इभ्या।  ने कुछ पल इभ्या के साथ बिताए। सुमित-अनामिका का अब किसी से वास्ता नहीं रहेगा...
    - सुमित ने 23 सितंबर को सूरत में एक नई जिंदगी की शुरुआत कर दी, लेकिन इभ्या की नई जिंदगी तो 22 अगस्त को ही शुरू हो गया था। उस दिन सूरत में माता-पिता ने दीक्षा लेने का फैसला लिया था। अब उनका किसी से कोई रिश्ता नहीं होगा। इभ्या से भी नहीं। कोई नहीं जानता कि इभ्या उन्हें फिर कभी मिल पाएगी या नहीं।
    - सूरत के वृंदावन पार्क में उस दिन काफी हलचल थी। कई लोग सुमित और अनामिका को समझा रहे थे। किसी ने कहा- जल्दी मत करो। बच्ची है। विचार करो, लेकिन वे जिद पर अडिग थे। उस दिन इभ्या को मम्मी-पापा के साथ नीमच लौटना था। मगर वह अपनी नानी की गोद में चित्तौड़गढ़ के कपासन लौटी। इभ्या के मन में मम्मी-पापा की उस दिन की आखिरी छवि बहुत धुंधली-सी है।
    नाना के घर पर हो सकता है इभ्या का लालन-पालन
    - नाना अशोक चंडालिया का घर इभ्या के लिए नया नहीं है। यहां सब चेहरे जाने-पहचाने हैं। इभ्या के नाना पांच भाई हैं। संयुक्त परिवार में सात मामा हैं। तीन मामियां हैं।
    - अशोक के इभ्या की उम्र के और भी पोते-पोती हैं। इभ्या हर समय किसी न किसी की गोद में है। लाड़ हमेशा से सबका था। अब कुछ ज्यादा है।
    - इभ्या के ताऊ अमित राठौर का परिवार नीमच से गुड़गांव शिफ्ट हो चुका है। इसलिए बहुत संभव है, उसका लालन-पालन नाना के घर में ही हो।
    मम्मी-पापा के बारे में कुछ पूछेगी तो नाना-नानी के पास क्या जवाब होगा?
    - कभी बड़ी होकर वह अपने मम्मी-पापा के बारे में कुछ पूछेगी तो नाना-नानी के पास क्या जवाब होगा? अशोक कहते हैं- हम उसे समझाएंगे। वैसे हमारे यहां बच्चे इस समझ से ही बड़े होते हैं, इसलिए लगता नहीं कि वह बड़ी होकर कोई सवाल करेगी।
    - दीक्षा लेने के बाद सुमित और अनामिका अपने नए नाम और रूप के साथ कभी नीमच या कपासन आएंगे? और उनके सामने इभ्या आई तो क्या होगा? क्या उनके मन में कोई याद ताजा होगी? दीक्षा का मार्ग सचमुच उन्हें अपनी पुरानी यादों से अलग कर देगा? इभ्या के लिए ये सारे सवाल बेबूझ बातों जैसे हैं। शायद बड़े होकर जब वह आचार्यों को सुनेगी और शास्त्रों को पढ़ेगी, तो खुद समझेगी।
    - अभी बेचैन-सी दिखाई दे रही नन्हीं इभ्या के मन में मां के आंचल की स्मृति एकदम ताजा है। अलग हुए अभी महीना भर भी नहीं हुआ। दादा-दादी के घर में काेई कमी नहीं थी। उसके आसपास हर साधन-सुविधाएं थीं। बड़ा घर। नई कारें। अच्छे से अच्छे कपड़े। मगर दीक्षा के बाद का सुमित-अनामिका का जीवन एक कठिन व्रत की तरह होगा। अब वे कभी स्नान तक नहीं करेंगे। किसी ऐसे कमरे में कभी नहीं रुकेंगे, जिसमें एक बल्ब या पंखा भी लगा हो। हमेशा नंगे पैर पैदल चलेंगे।

    ग्रीस से 32 लाख बैग एक्सपोर्ट करने का ऑर्डर था सुमित राठौर को, सूरत पहुंचे तो सब भूल गए
    - सुमित पिछले महीने आचार्य रामलाल के प्रवचन सुनने जब निकले तो ट्रेन में अपनी पहली बड़ी कारोबारी कामयाबी के किस्से सुना रहे थे। चित्तौड़गढ़ से आए ससुर अशोक को वे बता रहे थे कि बिजनेस अच्छा चल रहा है। ग्रीस से उन्हें 32 लाख बैग एक्सपोर्ट करने का पहला ऑर्डर भी मिला है। मगर 22 अगस्त की सुबह आचार्यजी की सभा में दीक्षा लेने की बात कहकर सबको चौंका दिया। वे भरी सभा में ही मुनि संघ के पीछे हो लिए थे।
    - अशोक ने कहा कि हम साथ ही गए थे। 28 अगस्त के हमारे रिटर्न टिकट भी साथ ही थे। उस दिन हम सब लोग सभा में पीछे थे। हमने देखा कि सुमित राजेशमुनि के साथ चल दिए थे। बाद में सबने उन्हें समझाया कि अभी दीक्षा लेना बहुत जल्दबाजी होगी। बच्ची छोटी है। मगर वे नहीं माने।
    - नीमच में फैक्ट्री सुमित ने ही 2013 में शादी के बाद शुरू की थी। सुमित के बड़े भाई अमित अपनी दोनों बेटियों के साथ गुरुग्राम में रहते हैं। नीमच में उनके पिता राजेंद्र राठौर और मां सुमन राठौर हैं।
    समझाया लेकिन सुमित और अनामिका नहीं माने
    - जैन धर्म रिवाज है कि अविवाहित की दीक्षा के लिए माता-पिता और विवाहित की दीक्षा के लिए पति या पत्नी की लिखित अनुमति जरूरी है। सुमित के लिए अनामिका की अाज्ञा जरूरी थी। अनामिका से पूछा गया तो उसने कहा- मेरी आज्ञा तभी है, जब मैं स्वयं साथ में दीक्षा लूं।
    - आचार्य ने सुमित से सिर्फ इतना कहा-आपकी भावना उत्कृष्ट है। धर्म के प्रति सजग हैं। मगर कुछ समय रुकना चाहिए। करीब दो घंटे तक समझाइश का दौर चला। सुमित इतने उतावले थे कि बोले- हमारा समय क्यों खराब कर रहे हैं। दो घंटे और निकाल दिए।
    - अगले दिन राठौर अौर चंडालिया परिवार के कई रिश्तेदार वहां पहुंचे। दोनों को समझाया। मगर सुमित और अनामिका नहीं माने। अशोक बताते हैं कि हमारे शास्त्रों में नौ वर्ष की आयु में कोई भी दीक्षा का फैसला ले सकता है।

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