चार कृषि विवि में बनेंगे जैविक खेती शोध व प्रशिक्षण केंद्र
मुंबई.

मुंबई.प्रदेश के चार कृषि विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र जैविक खेती शोध व प्रशिक्षण केंद्र बनाए जाएंगे। प्रदेश सरकार के कृषि विभाग ने इसके लिए प्रशासनिक मंजूरी दे दी है। कृषि विभाग ने इससे संबंधित शासनादेश जारी किया है। अकोला के डॉ. पंजाबराव देशमुख कृषि विश्वविद्यालय, परभणी के वसंतराव नाईक मराठवाड़ा कृषि विश्वविद्यालय, दापोली के डॉ. बालासाहेब सावंत कोंकण कृषि विश्वविद्यालय, राहूरी के महात्मा फुले कृषि विश्वविद्यालय में केंद्र बनाए जाएंगे। जैविक खेती शोध व प्रशिक्षण केंद्र बनाने के लिए चारों कृषि विश्वविद्यालयों को 500-500 लाख रुपए दिए जाएंगे। यह राशि केंद्र की प्रयोगशाला के लिए जरूरी उपकरण, शीत गृह, पशुधन व औजार खरीदने, खाद, सिंचाई के समान समेत कामों पर खर्च होगी। 

- सरकार का कहना है कि रासायनिक खाद के अधिक इस्तेमाल, साल भर में एक ही खेत में कई फसलों की बुवाई, कीटनाशकों के अधिक उपयोग करने, सिंचाई का सही तरीके से इस्तेमाल न करने और पर्याप्त बारिश न होने के कारण खेती में समस्याएं सामने आ रही हैं। इस कारण कृषि उत्पादन में गिरावट आती है।

-इसका परिणाम किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है। इस स्थिति में तकनीकी के सहारे जैविक खेती उपयुक्त साबित हो सकती है। इसके लिए गुणवत्ता प्रधान जैविक खेती पद्धति को विकसित करने की जरूरत है। राज्य के वित्त मंत्री 

सुधीर मुनगंटीवार

 ने साल 2016-17 के बजट में जैविक खेती व प्रशिक्षण केंद्र बनाने की घोषणा की थी।

सहकारी पतसंस्थाओं में जमा राशि को संरक्षण देने पर सरकार कर रही विचार: देशमुख

- प्रदेश सरकार नागरी सहकारी पतसंस्थाओं में जमाकर्ताओं की राशि को संरक्षण देने पर विचार कर रही है। शुक्रवार को प्रदेश के सहकारिता मंत्री सुभाष देशमुख ने यह जानकारी दी। देशमुख ने बताया कि राज्य की लगभग 15 हजार नागरी सहकारी पतसंस्थाओं में 25 हजार करोड़ रुपए जमा है।

- सरकार इन संस्थाओं में जमाकर्ताओं की एक लाख रुपए तक की राशि को महाराष्ट्र सहकार विकास महामंडल के जरिए संरक्षण देने पर विचार कर रही है। इसके लिए कुछ नियम और शर्त तय किए जाएंगे। इस बारे में जल्द ही फैसला लिया जाएगा।

- देशमुख ने बताया कि पतसंस्थाओं से एक लाख रुपए तक की जमा राशि को संरक्षण देने के संबंध में चर्चा हुई है। इसके लिए पतसंस्था भी तैयार नजर आ रही हैं। देशमुख ने बताया कि पुणे में पतसंस्थाओं के प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक के दौरान बकाया राशि वसूलने के लिए सहकारिता कानून में ठोस प्रावधान करने, सरचार्ज वसूली के लिए नीति बनाने, वसूली अधिकारियों को तीन साल के लिए अधिकार देने, रजिस्ट्रार को 60 दिनों में निर्णय लेने का अधिकार देने समेत मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हो चुकी है।

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